Art is the language of the heart
कला क्या है.. ? (मैंने पूछा)
यह एक ऐसा सवाल है जिसे हर किसी ने अपनी तरह से परिभाषित करने की कोशिश की है और उसका तर्क सही भी है । मेरा मानना है की कला जैसे विषय को एक या दो लाइनों में परिभाषित कर पाना कठिन है, कला की किसी एक विधा में इतनी गहराई है जिसे नापा नहीं जा सकता तो सम्पूर्ण कला को कैसे एक जीवन में समझा जा सकता है । मैं कला के लिए सिर्फ एक बात बोलता हूँ की ....
आर्ट इज़ द लैंग्वेज ऑफ़ हार्ट ।
कला ठीक उसी तरह हैं जैसे हम हवा का आनंद लेते है, जैसे हम ईश्वर की उपासना करते है,जैसे हम नदी पर्वतो और समंदर को देखते है ठीक वैसे ही कला एक प्रकार का सुख है ,जिसे हम महसूस करते है,हम इसे लिख नहीं सकते ,बता भी नहीं सकते ।
कला आप को स्वयंभू बनती है,आप के भीतर की कलए की आप की श्रेष्ठता निर्धारित करती है यदि आप कला विहीन है तो निश्चय ही आप में भाव नहीं होंगे और यदि भाव ही नहीं है तो आप इन्शान नहीं हो सकते ।जब कोई कलाकार किसी कला का सृजन करता है तो वह अपने उन भाव को व्यक्त करता है जिन्हे वो अन्य किसी तरीके से नहीं व्यक्त कर सकता ।कला आप को ईश्वर के करीब लेजाती है कला आप को इस नश्वर शरीर से ऊपर ले जाती है जीवन का आनंद दिलाती है,चित्र बनाना ,मूर्ति बनाना,नाचना ,गाना,कोई वाद्य यंत्र बजाना ,कविता लिखना या कवित्त पाठ करना,कपडे सिलना,बाल बनाना ,श्रृंगार करना ऐसी तमाम चीजे है जो कला के क्षेत्र में आती है । भारत मुनि ने ६४ कलाओ की बात कही है।मैं इन कलाओ को कभी भी अलग कर के नहीं देखता,मेरा ऐसा मानना है की कलए आपस में सम्बद्ध होती है ,कुछ हद तक एक दूसरे पर निर्भर भी होती है,एक कला का छात्र होने के नाते मैंने इन कलाओ को एक दूसरे के साथ ही जोड़ कर देखा है,जिस समय मैं कॉलेज में था तब मैंने सबसे ज्यादा काम पत्थर में किया है,मुझे बहुत मज़ा आता था जब पत्थर जैसा सख्त माध्यम भी आप की रचना के सामने नदमस्तक हो जाता है,कठोर पत्थर आप की कला के रचनात्मक अविष्कार को स्वीकार कर आप के मुताबिक चलने लगता है और नए आकर में सज सवर कर तैयार हो जाता है,यह सिर्फ पत्थर के साथ नहीं है रंगो के साथ भी है । आप को पता है मुझे ये सरे रंग किसी चंचल बच्चे की तरह लगते है । हमेशा दौड़ते भागते,पकड़ में न आने वाले, शरारती मगर ज्यो ही बिखरते त्यों रौनक सी आजाती, ऐसे घुल मिल जाते मानों बरसो से साथ हो । सोच कर देखो अगर रंग न होते तो क्या होता...............कुछ भी नहीं होता ।
रंगो के बिना इस समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती ।

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