एक गांव था..

गांव था जो हरे हरे खेतों के बीच किसी द्वीप जैसा दिखता था,गांव के द्वार पर खड़ा था एक बूढ़ा पीपल, जो कुछ बोलता नहीं था,बस मुँह फुलाए देखता रहता था हर आने जाने वाले को, पता सब था पर उसे क्या पड़ी थी किसी की बुराई करे या तारीफ करे| पीपल के पास था गुड़ बनाने वाला कोल्हू,सर्र्दियो में क्या महक आती थी,मुझे मीठा कुछ खास पसंद नहीं पर उस गुड़ की मिठास अभी भी है जुबान पर| वही सामने ही तो था स्कूल| स्कूल तक में भर जाती थी महक, हल्का कोहरा जिसमे से गुड़ की भट्टि का धुवा अलग कर पाना कठिन था, स्कूल से कमीरा बाबा(पीपल) भी तो साफ नही दीखते थे|हाँ अगर कोई अलाव जलाता तो लाल पीली रोशनी दिखती थी और उसके पास बैठा दीखता था इन्शान | सर पर बड़ा सा पग्गड़,लिहाफ़ लपेटे,घुटनों तक धोती बांधे इन्शान.हुक्के में अलाव से आग निकाल कर भरते हुए कुछ गुनगुना रहा था..(उठो अलबेली बाहरि लाओ अँगना)....इतना शांत था सब कुछ की उसकी गवई साफ सुनाई दे रही थी, अभी भी जब शांत होता हूँ तो सुनाई देती है,बाहर जाकर भी देखता हूँ पर भीड़ के सिवा कुछ नही दीखता न अलाव न इन्शान,न गुड़ की महक न कमीरा बाबा,कुछ भी नही दीखता
बथुवा और उरद की दाल(सागपाहिता) और चावल उसी अलाव के पास बैठ कर खाता था इन्शान और उसके बच्चे जो अब मशीनों में बदल गए है, वो भी .. । क्या स्वाद था.खैर स्वाद गुड़ का हो या सागपाहिता चावल का काफी पीछे छूट गया| उस इंसान के गांव में कोई बड़ा होता तो उसकी उम्र से न कि दिखावे से| सम्मान और लिहाज कुतर्क से बचा लेते थे ..
दूबर(तांगे वाला) के तांगे की छन छन पहले ही बता देती कि गांव में किसी के घर मेहमान आये है,मेहमान एक के घर एते खुस पूरा गांव होता, जब तक मेहमान रहते तो रोज किसी के घर से मूँगफली भुन कर आती तो किसी के घर से आलू,कोई उन्हें खेत घुमाने ले जाता तो कोई मछलियों के शिकार पर| भले कोई एक दिन के लिए आये या तमाम दिनों के लिए, एक बार यह जरूर बोलता..(शहर जाना मजबूरी न होती तो इधर ही रह जाते) जब मेहमान जाते तो सियाराम,सलीम बडको मंझीलो जैसे तमाम लोग बाहर तक छोड़ने जाते,भैया फिर आयो जरूर,दुल्हिन कायः हमार नमस्ते कहि देहो) जैसे बातो से माहौल ऐसा होता कि कमीरा बाबा भी उदास हो जाते,लाठी के सहारे खड़ा इन्शान हुक्का पीने का ऐसा नाटक करता जैसे उसे फर्क नहीं पड़ा हो,… फर्क तो पड़ता है साहब,कहो या न कहो,आज घर में चाहे जितना बड़ा टीवी हो वो मजा नहीं आता जो तब अत था,रंगोली चित्रहार,रामायण महाभारत,और उनसे जुड़े गांव वालो के अबोध सवाल, कितना सरल था इन्शान

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