College of Art and craft Lucknow
मुझे बाकि जगहों के बारे में ज्यादा जानकारी तो नहीं पर इस कॉलेज को अच्छे से जनता हूँ,यहाँ जो भी लोग मिलते है वो दिल के साफ होते है।आर्ट्स कॉलेज एक खूबसूरत दुनिया थी उचे ऊंचे पेड़ो से घिरी एक पुरानी सी ईमारत जो अपने भीतर हज़ारो कहानिया समेटे शांत खड़ी दिखती है ।मेन गेट से अंदर आते ही आप एक अलग सी जादुई दुनिया में प्रवेश कर जाते हो ऊंची छतो और मोटी दीवारों वाली इस ईमारत का इतिहास बहुत पुरांना है,मेरे जैसे बहुत सरे कला के उपासक यही से निकले कुछ ने विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाई और कुछ अतीत का हिस्सा बन कर रह गए।ऐसा नहीं है जो इस मंदिर से निकल कर बड़े बने उनका जितना हक़ है इस पर उतना उनका भी जो अतीत के गलियारों में गुमशुदा है ।तमाम गौरव गाथाये है तो तमाम प्रेम कहानिया जो कैंटीन से लेकर टैगोर चौराहे तक बिखरी पड़ी है ।इस ईमारत की दीवारे तक यहाँ कभी कला साधना कर चुके कला योगियों के हस्ताछरो से भरी पड़ी है ।यहाँ रखे मूर्तिशिल्प मुस्कराते हुए आज भी अपने कलाप्रेमी का इंतज़ार करते मिल जायेंगे इनसे बात करो तो ये बताएँगे वो कितना शांतिप्रिय रहा होगा या शरारती,कैसे वो चिढ़ जाता था जब उसके इस मूर्तिशिल्प पर कोई अपना बस्ता या पानी की बोतल रखदेता था,अपने खास दोस्त से भी लड़ाई कर ली थी उसने जब उसके दोस्त ने काम पर पि.ओ.पि. के छींटे मर दिए थे ।ये वाला पेड़ या वो वाला या फिर वो सरे पेड़ जानते है इनके पास बैठ कर लैंडस्केप बनाया करते थे कला साधक ।क्लास रूम के भीतर या बाहर,हर जगह पढ़ाई होती थी और हर जगह मस्ती । इनके रास्तो पर चलते हुए बहुत बार ऐसा लगा की जैसे इतिहास साथ -साथ चल रहा है ।पीछे की ओर जो हॉस्टल है ये भी कोई आम हॉस्टल नहीं है आज के या आज से पहले के तमाम बड़ी हस्तियों को इसने छेड़-छाड़ करते ,एक दूसरे का तौलिया खींचते शोर मचाते,नाचते हुए देखा है।चोरी से ही सही- हीटर पर बना दाल चावल की महक इसे बेहतर पता होगी,शाम का वॉलीवॉल का मैच या क्रिकेट और फिर देर रत तक काम ,इसे याद ज़रूर होगा।इस कॉलेज में आप को किसी गंभीर मुद्दे पर बात करते लोग मिल ही जायेंगे और ये बहस कॉलेज से उठ कर मनकामेश्वर मंदिर की चाय पर ही ख़तम होती थी ।अच्छा चाय की भी एक खास रोल इस कॉलेज में,आप किसी से भी बात करने की कोशिस करिये वो बोलेगा चलो चाय पीते पीते बात करते है,ऐसा नहीं है की चाय बहुत अच्छी बनती है बल्कि चाय से याराना ही कुछ ज्यादा होता है यहाँ के लोगो का ।चाय एक तो कम बजट की चीज है और थकान मिटाने के साथ -साथ जगने में भी मदत करती है । बड़ी से बड़ी प्लानिंग यहाँ चाय की दुकानों पर हो जाती है ।चाय की दुकानों पर लोगो की समस्याएं चुस्कियों में सॉल्व हो जाती है । कॉलेज के सामने गोमती नदी है,जिसके किनारे आप को संजीदा बनाने के लिए काफी है । बड़ी ही अद्भुत जगह है
कॉलेज की मेन बिल्डिंग से थोड़ा अंदर जाके मूर्तिकला विभाग का मास्टर्स डिपार्टमेंट है ,ये कभी प्रिंसिपल बंगलो हुवा करता था। कॉलेज से एम्.ऍफ़ ए तक जाने का रास्ता यु तो साधारण सा है पर इस कॉलेज वाले लोग जानते है पतझर के मौसम में ये किसी स्वर्ग के द्वार सा लगने लगता है,जब अशोक के पिले- पिले पत्ते ज़मीं पर बिछ जाते है .या फिर सर्दियों के मौसम में जब कुहरे में सूरज की रौशनी इन्ही पेड़ो से छान कर आती है तो ऐसा लगता है की चलते चले जाये जहा तक स्वर्ग की अनुभूति हो रही है ।तेज गर्मी भी यहाँ आकर अपना गुरुर छोड़ देती है ।और अगर आप डिपार्मेंट की बात करो तो वह पहुंच कर लगता है की ये दुनिया का वो हिस्सा है जिसे कोई फर्क नहीं पड़ता की दुनिया में क्या हो रहा है ,एक अलग सी बात है इस जगह में ।फिर आप की नज़र जाएगी ज़मीं पर बिखरे मूर्ति शिल्पो पर जिन्हे देख कर आप को एक बार तो ऐसा लगेगा जैसे इन्शान बनाने का कारखाना ब्रह्म देव ने यही बनाया है ,कुछ अधूरी कुछ पूरी मुर्तिया ,कुछ पत्थर कुछ प्लास्टर की मुर्तिया आप का ध्यान ज़रूर खींच लेंगी । अगर आप किसी दिखावे वाली दुनिया का सपना रखते है तो ये कॉलेज आप के लिए बिलकुल भी नहीं बना है ।आप अगर शांति और शुकुन से जीने में विश्वास रखते है तो ये आप के लिए ही बना है ।अगर आप आजाद होकर पढाई करने के इच्छुक है तो भी ये आप के लिए है ।
Ashish Mohan




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