क ,ख ,ग ,घ ,ङ ......... ख़ाली

मैं अपनी ज़िंदगी के कुछ खास किस्से आप को सुनाता हूँ,मैं अपने माँ बाप की इकलौती संतान हूँ,पर वो इकलौती संतान वाला प्यार कभी नहीं मिला,जूता चप्पल इतने पहने नही है जितने खाये है,और ये सब सिर्फ इसी लिए की मुझे तारे ज़मीं पर वाले ईशान की बीमारी थी,पढ़ाई में मज़ा ही नहीं आता था..रोज अपनी परेड करवाने के बाद ही सोता था, उस समय तो लगता था रिस्तेदार भी खून चुसने ही आते है,जब देखो (बेटा किस क्लास में हो,पढ़ाई कैसी चल रही है,कुछ सुनाओ) इस पर भी पेट नहीं भरता तो अपने बच्चो की तरीफ करने लग जाते,मैं समझ जाता बेटा आज तुझे रोज से ज्यादा पड़ने वाली है,और वही होता था.. चलो खैर गिरते पड़ते ९ तक तो पड़ गए,फ़िर था १०,भाईसाब,,जी तो करता था आत्महत्या ही कर लूँ,एक तो वैसे ही पढ़ाई में मन नही लगता था ऊपर से बोर्ड ,बच्चे की जान ले रखी थी सबने,उस समय मुझे घरवाले गब्बर सिंह लगते थे और मै बसंती,कसम से इतना नचाया जाता था कि पूछो ही मत,एक दो बार तो घर से भागने की भी कोशिश की पर माँ का सोच कर रुक गया,मुझे ऐसा लगता है अगर उस समय कोई मुझे समझता तो शायद मैं फेल न होता,ऐसा नही था की मैं पढ़ना नहीं चाहता था पर मुझे मज़ा नहीं आता था, मैं अगर कोई कहानी पढ़ता तो थोड़ी देर बाद वही सारे किरदार मेरे आसपास नज़र आते, मैं खुद हीरो बन जाता, मैथ तो मुझे चुड़ैल सी लगती थी,मुझे ऐसा लगता था कि जैसे सारी किताबे मुझे चिढ़ा रही है,ये शायद इस लिए रहा होगा क्यों की किसी ने प्यार से समझाया ही नहीं,किसी और तरह से पढ़ाया ही नहीं ,वही एक पुराना तरीका चरवाहो वाला उसी से हांकते रहे मुझे I नाली से घर का पानी निकल सकता है नदी नही, इतनी सी बात किसी को समझ क्यों नहीं आयी, जबरदस्ती मुझे उन्ही दकियानूसी तरीको से चलने का प्रयास करते रहे, मै नही कहता की वो मेरे भले के लिए नहीं था- बिलकुल था पर तरीका सही नहीं था, मैं खुद एक अध्यापक हूँ आज, मैं अपने बच्चो के साथ बिलकुल भी उस तरह से व्यवहार नहीं करता जैसे तब होता था, ज्ञान सहज होता है,उसे ग्रहण करने का तरीका सबका अलग अलग होता है,हर बच्चे का मानसिक स्तर अलग होता है I टीचर का फ़र्ज़ है की उसकी बाते सभी को सामान रूप से समझाए,अगर नही आती तो वो पुनः समझाए,एक क्लास में अगर २० बचे है तो वहां पर २० तरह के दिमाग होंगे,२० तरह के परिवेश वाले लोग होंगे,हो सकता है कि उनकी भाषा भी अलग हो,सोचने का ढंग अलग होगा,अगर ऐसा नहीं होता तो एक कलश के सभी बच्चे अलग अलग दिशाओं में भविष्य क्यों बनाते है,अमिताभ बच्चन के साथ पड़ने वाले सभी क्या स्टार बन गए ,या फिर सचिन के साथ पढ़ने वाले सभी क्रिकेटर? फिर....... मुझे याद है जब मैं पढ़ता था तब हमें रटा दिया गया था कि अशोक चन्द्रगुप्त का पोता और बिन्दुसार का बेटा था,पर ये नही बताया की चंदरगुप्त कौन था,बिन्दुसार कौन था,क्या फायदा था इस रटंत विद्या का । जब आप को कोई नहीं समझता तो फिर आप चिड़चिड़े हो जाते हो,आप अपने जैसे लोगो की तलाश में लग जाते हो,मिलते है लोग,आप फिर उन्हीं की तरह होने लगते हो,आप के रास्ते गलत भी हो जाते है,भटक जाते हो कभी कभी तो इतना दूर चले जाते हो जहां से वापस आने में समय लगता है । नौकरी की भूख,पैसे की भूख,स्टेटस की भूख,बराबरी की इच्छा,माँ बाप को अँधा कर देती है,और बलि चढ़ जाता है बच्चे का बचपन,उसके सपने ,यही वजह है की हमारे समाज में इन्शानो से ज्यादा कोल्हू के बैल है यही वजह है की लोग फ्रस्टेट हो गए है,मानसिक रोगी बन गए है,अपराध बढ़ गए है,ज़रूरते भावनाओ पर चढ़ कर बैठ गयी है,इन सब की शुरुआत हमारे बचपन से ही हो जाती है,घटिया पाठ्यक्रम,चरवाहो जैसे टीचर,ज्ञान से ज्यादा दिखावा । एक लकीर सी खींच दी गई है औरसब को उसी पर दौड़ने को बोला जा रहा है,कमाल की बात ये है की ये सदियों से होता आरहा है और हम बदलना ही नहीं चाहते । हमारे देश में बहुत से लोग डिग्री धारी है वो भी बड़ी डिग्रियां,पर ज्ञान न के बराबर,ये डिग्रियां सिर्फ और सिर्फ नौकरी पाने के लिए है,क्या करे फोर्मेट ही ऐसा है । आप कितने भी गुणी हो,आप से नहीं पूछा जायेगा,अगर आप के पास कोई कागज़ का टुकड़ा नहीं है,अगर है तो आप को टीचर तक की नौकरी मिल जाएगी,जिसका ज्ञानी होना ज़रूरी है,आप अगर किसी ऐसी विधा के माहिर हो जो आप को अलग करती है बाकि लोगो से तो आप ये मान लो की आप को समाज जीने नही देगा,आप को अपना परिवार पालना भी कठिन हो जायेगा………..माफ़ करियेगा मैं थोड़ा भावनाओ में बाह गया । मैं किसी को भी गलत नहीं ठहराना चाहता पर क्या करू जो देख रहा हूँ उस पर चुप भी तो नहीं रह सकता ।मेरी शुरुआती पढ़ाई गांव के प्राइमरी स्कूल से हुई है आज जो सुविधाएं दी जा रही है स्कूल में वो तब नहीं थी । उस वक़्त प्राइमरी स्कूल में भी पढ़ाई होती थी,टीचर टाइम पर आते थे मुझे यद् है की हमारी बारी लगती थी बरी नहीं समझ पाए होंगे आप तो बता दूँ उस समय स्कूल में ४-४ या ५-५ बचो के ग्रुप बनाये जाते थे और उन्हें अलग अलग दिनों के हिसाब से ज़िम्मेदारी देदी जाती थी । उन बच्चों का काम था की वो अपनी बरी में स्कूल जल्दी आएंगे और स्कूल की सफाई करेंगे,पट्टिया बिछाएंगे ,टीचर की कुर्सी साफ करेंगे,पिने का पानी भर कर रखेंगे ,और यह सब करने के लिए हमारे परिवार वाले भी नहीं टोकते थे क्यों की वो जानते थे की गुरु और गुरुकुल की सेवा पत्येक बिद्द्यार्थी का फ़र्ज़ है । उस समय स्कूल जाने में उत्साह होता था,पढ़ाई की तरीके भी अलग थे,स्कूल के बस्तो में आम ,इमली, सौफ,कंचे,इनका वजन किताबो से ज्यादा होता था,किताबे हरसाल खरीदी नहीं जाती थी बल्कि सीनियर से आधे दामों में लेली जाती थी,आज सरकार ने सुविधाएं बड़ा दी है तो क़्वालिटी ऑफ़ एजुकेशन ख़तम हो गयी,टीचर सिर्फ सेलरी लेना चाहता है, मज़बूरी में बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजना पड़ता है जो बच्चों के विकाश से ज्यादा आप के विनाश पर जोर देते है ,और फिर आज महंगे स्कूलों में पढ़ना स्टेटस की बात है ,आप को आप की तथाकथित सभ्य समाज में सर उठा कर चलने के लिए ऐसा करना ही पड़ता है । मैं ये इस लिए नहीं कह रहा क्यों की मैं खुद प्राइमरी से पढ़ा हूँ ,बल्कि इस लिए कह रहा हूँ क्योकि मुझे ये दीखता है , महंगी महँगी किताबे,भरी भरकम बास्ते,और उनके निचे आधा झुका हुवा बचपन,और उस बचपन को खड़ा रखने के लिए अपने जूते,किश्मत और पैसे की बलि चढ़ाता पिता या वो जो परिवार चला रहा है माँ, बाबा, चाचा कोई भी ।मैं कहता हूँ की चलो पैसो की बलि चढ़ जाये कोई बात नहीं,जूते घिस जाये कोई बात नहीं पर वो जो मासूम सा बचपन कही सिमट रहा है उसे क्या करे । चलो एक बार को भी मन लेते है की आज बचपन जला कर कल जवानी रोशन हो जाएगी तो भी सही है,आप को दी जानेवाली शिक्षा प्रेक्टिकल लाइफ में काम नहीं आती,तो क्यों खून कर रहे है बचपन का, क्यों नहीं जीने देते उन्हें,बच्चे के मानशिक स्तर को समझिये उसकी रूचि के हिसाब से उसे चलाइये । उसे चलने दो धकेलो मत, एक बड़ा ही अच्छा शेर है की....... उड़ेगा अपनी मर्ज़ी से तो सात आशमानो की खबर लाएगा, उड़ाया जायेगा तो, परिंदा छत पर बैठ जायेगा । आप अपने बचपन में क्या बनना चाहते थे या आप क्या नहीं कर पाए उसे बच्चों पर मत थोपिए,ज़रूरी नहीं की आप की तरह वो भी सोचे या चले,दिक्कत ये है की हम अपने बच्चों से प्यार बहुत करते है,उन्हें समझते बिलकुल भी नहीं,आप ज्यादा प्यार करते है तो उसे खुद से दूर नहीं जाने दोगे तो आप का बच्चा फूलकुमार बन कर रह जायेगा,ज्यादा प्यार है तो आप उसे वो पढ़ाई पढ़ाओगे जिसमे उसे ज़रा भी कस्ट न हो ,उस स्कूल में भेजोगे जहा सारी सुविधाएं होंगी,पर एक बात यद् रखिये भाव हमेशा आभाव में ही पैदा होता है,। अगर आप अपने बच्चों को समझते है तो आप हमेशा उनका भला सोचेंगे ,उनकी प्रगति में बाधा नहीं बनाएंगे तब फिर आप अपने बच्चों को चार लोगो के हिसाब से चलने के लिए मज़बूर नहीं करेंगे ,आप को कोई फर्क नहीं पड़ेगा की आप को लोग क्या कहेंगे । आप सिर्फ इस बात से मतलब रखेंगे की बच्चे खुस है या नहीं, । ज्यादा प्यार नहीं होगा तो ज्यादा उम्मीदे नहीं होंगी ,ज्यादा उम्मीदे नहीं होंगी तो ज्यादा कस्ट नहीं होगा ,ज्यादा कस्ट नहीं होगा तो ज्यादा खुशियां होंगी...और यही तो चाहिए,तो इस लिए अपने बच्चों को प्यार भले काम कीजिये समझिये ज्यादा ।

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