ज़िंदगी तू भी न .. |
हमारी ज़िंदगी जो की हमारी है हम उसे कितना जानते है,क्या हम उसे एक लाइन में लिख सकते है । क्या हम उसे बेहतर समझते है । क्या हम अपनी ज़िंदगी को वैसे ही जी रहे है जैसे हम चाहते है । हमारी ज़िंदगी दूसरों से अलग कैसे है । ऐसे तमाम सवाल है जो हमारी ज़िंदगी हमसे पूछती है और हम बात को रासन की लिस्ट में या ऑफिस की फ़ाइल के निचे दाब देते है और बिस्तर की सिलवटों में भर कर मर जाते है । सुबह होती तो है मगर क्या हम जागते है,नहीं न । फिर वही सरे सवाल दरवाजे पर किराया मांगने वालों की तरह खड़े हो जाते है और हम खिड़की से कूद कर निकल जाते है अपना तमसा बनाने, खुद को बेचने । शरीर ज़िंदा रखने के चक्कर में ज़िंदगी कहीं अधमरी सी हो गयी है,घिसट रही है । टाय की गांठ कुछ ज्यादा ही कस रही है, कहीं मर ही जाये ज़िंदगी । क्या ज़िंदा रहना इतना ज़रूरी है और अगर है तो सिर्फ ज़िंदा ही क्यों रहा जाये ज़िंदगी जी क्यों न जाये । तो आओ न जीते है ज़िंदगी । कल का सूरज हम उगाएंगे,आसमान अपने हाथों से साफ करके बड़ा बड़ा आगाज़ लिखेंगे । अब ज़िंदगी घिसट घिसट के नहीं चलेगी बल्कि हमारे कंधे पर बैठ के चलेगी ।जब हम अंतिम सांसे ले रहे होंगे तब भी ज़िन्दगी कोई लतीफा सुना कर हसाएगी और हमारे अंतिम शब्द होंगे - ज़िंदगी तू भी न ।
तुम्हारी ज़िंदगी तुम्हारे लिए तोहफा है ,इसे किसी उत्सव की तरह जियो।
एक सुबह
जो उगेगी-
मेरी डायरी ठीक बीचोबीच से,
जिसमें मेरी कविता के शब्द-
गौरैया से चंचल हो उठेंगे और
गुनगुनी चाय के प्याले से बना-
कत्थई चांद
डूब जाएगा मेरी मेज के गंभीर आकाश में,
तुम देखना एक लाल रंग की बिंदी
कविता के शीर्ष पर रख कर
वो सुबह अमर कर दूंगा।
बादलों के नर्म टीले पर बैठा
बारिश में स्याही घोल कर
तमाम छतों पर कविता लिखना चाहता हूं।
मैं एक सुबह जीना चाहता हूं।
Ashish Mohan Maqtool
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