कला..2
कला की व्याख्या करना या इसकी परिभाषा देना आसान नहीं है ।कला को प्रत्येक व्यक्ति या कलाकर अपने ढंग से व्याख्यायित या परिभाषित करता है ।किसी के लिए भावनाओं को व्यक्त करने का साधन है तो किसी के लिए कला संचार का माध्यम ।सबसे कमाल की बात तो यह है कि किसके सम्बन्ध में दी गयी कोई भी परिभाषा गलत नहीं होती ।मैं तो जब भी कभी कला के बगैर समाज कि कल्पना भी करता हूँ तो डर जाता हूँ क्यों कि यदि कला नहीं होगी तो ये समाज भी नहीं होगा ।
कला का आरम्भ कब हुवा ।ये एक दिलचस्प सवाल है ।इसके लिए मैं एक बात बता दूँ कि जब भी हम कोई नयी चीज बनाते है या ये कहूं कि जब भी हम किसी नयी चीज का अविष्कार या खोज करते है वो सबसे पहली बार में वो कला ही होती है ।तो इस तरह से जब भी हम मानव जीवन कि शुरुवात मानते है तभी से कला कि शुरुवात भी हुयी होगी ।जब मानव ने पहली बार आग जलाई होगी तो वो कला थी .जब उसने शिकार के लिए औजार बनाये होंगे तो वो कला थी ,शिकार के बाद जीत कि खुसी में जब वो पहली बार नचा होगा वो कला थी ,पहला घर ,गुफा में चित्रकारी ये सब कला ही तो थी ।कला ही वो ऊँगली थी जिसे पकड़ कर मानव ने चलना सीखा होगा ।
Ashish Mohan Maqtool


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