चाय और दर्शन...2
कुछ देर तक माहौल शांत रहा फिर मेरे दोस्त ने कुछ लाइने बुदबुदाई -
सवाल उठते रहे -
जवाबों कि तलाश में ,
और हम
ढूंढ़ते रहे खुद को-
इन्शानियत कि लाश में ।
विचारों कि सड़न,
उसूलों का कफ़न
मेरे सामने पड़ा था,
हम सधे खड़े रहे -
बनावटी लिबाश में ।
मेरी आखों में पानी था
आज मैं एक कहानी था,
सब पी चूका था मैं
कुछ भी नहीं था बाक़ी
जज़्बातों के गिलाश में ।
मेरी लाश मेरे कन्धों पर थी
कई ज़िंदगी मेरे कन्धों पर थी
मैं चला जा रहा था -
कहीं पहुंच जाने के अहसास में ।
चरों ओर था घनघोर अँधेरा
मैं भूल चूका था नाम मेरा,
मैं गिरा -फिर उठा
दोबारा जीने कि आस में ।
अरे वाह ये तुमने लिखी ? (चाचा ने पूछा ) मुझे वो नज़्म लिख कर देदेना । तो सुनो मेरे बच्चों ज़िंदगी होती क्या है ,यही सवाल है न तुम्हारा ।ज़िंदगी को किसी भी तरह से परिभाषित नहीं क्या जा सकता । पत्येक व्यक्ति इसे अपने अपने ढंग से जीता है उसे जीने का तरीका ही उसकी अपनी ज़िंदगी कि परिभाषा बन जाता है । ज़िंदगी कितनी गहरी है ये समझ पाने के लिए उम्र का ज्यादा होना ज़रूरी नही,आप अगर समझ रहे है तो या प्रयास भी कर रहे है तो आसानी से समझ पाएंगे, मै इस बात से भी इंकार करता हूँ की ज़िंदगी का मर्म आप को कोई खास इंसान या किताब ही समझा सकती है,हर इंसान इसे अपने तरीके से समझता है ज्ञान और विवेक के आधार पर ही तर्क देता है..हर आदमी की दर्शना है,इसलिए अगर ज़िंदगी को समझना है तो अपनी आंखें खुली रखो और अपने दिमाग से काम लो,मै ये नही कहता कि सामने वाला आप को गलत सलाह दे रहा है,मगर उसकी सलाह उसके ज्ञान और उसकी परिस्थिति पर निर्भर होती है. तो मेरे भाई......सुनो ज़रूर सब की मगर करो अपने दिल की,आप का दिल आप को बहुत अच्छे से जानता है,जब से आप पैदा हुए हो तबसे दिल ही है जो आप के साथ था, जब आप दोस्तों के साथ थे ,जब आप स्कूल में थे,जब आप ने पहलीबार सुट्टा मारा था,पहला मस्टरबेशन,पहले ब्रेकअप,हर जगह यही था आप के साथ, इसे आप की कमियां और खूबियां सब पता है,और ये गलत सलाह नही देता,वो बात और है की हम सुनते नहीं,और फिर मरवा लेते है । भाइ एक बार दिल पर हाथ रख कर अगर पूछो तो हर सवाल का जवाब मिलेगा,ये दिल जो होता है वो सिर्फ प्यार क मामले में बेवकूफ होता है बाकी हर चीज में बिंदास.
तुम ऐसे कैसे कह सकते हो कि किसी से सलाह नहीं लेनी चाहिए या फिर दूसरा कोई सही सलाह नहीं देसकता ।?(चचा ने पान का पीक हलक में उतारते हुए पूछा )
(दोस्त ने चाचा का मुँह देखा और बात जारी राखी ) अच्छा एक बात सोच कर देखो...अगर एक मिठाई बनाने वाला है और उसकी मिठाई में कोई दिक्कत आती है तो वो किसी साईकिल बनाने वाले से सलाह लेगा तो क्या सलाह मिलेगी..ठीक वैसे ज़िन्दगी है । भाई मैं जितना समझ पाया हूँ उस हिसाब से ज़िंदगी को ज्यादा हड़बड़ाहट से नहीं जीना चाहिए, ये बिलकुल वैसे ही है जैसे किनारे बैठ कर नदी देखते हैं, छत पर लेट कर आकाश को देखते है...नदी में कभी पूजा क फूल बह कर आएंगे कभी चिता के, आकाश में कभी पंछी उड़ते दिखेंगे कभी बादल । ज़िंदगी जीने की चीज है,जितने ज्यादा चुतियापे फैलाओगे उतना ही लाइफ की ऐसी तैसी करवालोगे. अपनी बाहें फैलाकर किसी ऊंचे पहाड़ से खुद को I love you बोल कर तो देखो,किसी दिन खुद से पूछो..भाई बोल आज क्या खायेगा,चल तुझे पार्टी देता हूँ । जी लो नही तो ये जो समाज है वो जॉम्बीज़ की तरह है, ये काट लेगा तुम्हे और तुम भी नरभच्छी बन जाओगे, तो इसलिए तेल लगाने दो दुनिया को,तुम तो बस जी लो.
जा सिमरन जा ... जी ले अपनी ज़िंदगी

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