कहानियों का सौदागर- उत्कर्ष चतुर्वेदी

मेरे लिए यह तय कर पाना बहुत मुश्किल हो रहा है कि मैं उत्कर्ष चतुर्वेदी से बात शुरू करू या फिर उनकी फिल्मों से। चलिए बात शुरू करते हैं कहानी के हीरो से,उत्कर्ष चतुर्वेदी से। उत्कर्ष को अभी तक मैं जितना जान पाया हूँ उस हिसाब से मैं ये कह सकता हूँ की एक लड़का जो कहानियो का सौदागर है। कहानियो में खुद को ढूंढ़ लेना हो या फिर अपने आसपास से कहानी को खोज लेना , उत्कर्ष दोनों ही फ़न में माहिर हैं। ज़िन्दगी को अपने ही ढंग से जीने वाला ये कहानीकार इन दिनों कैमरे के पीछे खड़े होकर नए नज़रिये से कहानियां दिखानें का जिम्मा उठाया है। उत्कर्ष चतुर्वेदी का जन्म 1 नवंबर 1999 को मथुरा, भारत में हुआ था। वह सबसे कम उम्र के फिल्म निर्माता और फिल्म गीक में से एक हैं। वह आईआईटी मद्रास से फिल्म एप्रिसिएशन कर रहे हैं और जगन्नाथ यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की डिग्री भी हासिल कर रहे हैं। इसके साथ ही वह एक बांसुरी वादक और कहानीकार और विभिन्न पुरस्कारों के प्राप्तकर्ता हैं और उनकी फिल्म को आरके फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ फिल्म के रूप में सम्मानित किया गया है। उन्हें उनकी हाल ही में मशहूर शॉर्ट फिल्म मिसिंग फेसेस (2019) के लिए जाना जाता है। उन्होंने भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव 2020 में सर्वश्रेष्ठ संपादक और दूसरे नवादा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव 2021 में सर्वश्रेष्ठ महत्वाकांक्षी फिल्म निर्माता का पुरस्कार भी जीता।
कल रात ही उत्कर्ष की एक शॉर्ट फिल्म ( देशभक्त ) देखी। तकरीबन ४ से ५ मिनट की यह फ़िल्म दअरसल एक नजरिया है , देश के प्रति किसी के प्यार को देखने का। अमूमन ऐसा होता है कि किसी ऑटो रिक्शा में बैठने से पहले हम फूहड़ गानों के लिए अपने कानो को तैयार कर लेते है मगर हर बार ऐसा नहीं होता। कभी आप को सच्ची देश भक्ति भी देखने को मिल सकती है बशर्ते कहानीकार उत्कर्ष जैसा होना चाहिए। उत्कर्ष की एक और फिल्म ( वॉकिंग अंडर द सन ) विश्व मंच पर इनदिनों काफी चर्चा में है। उत्कर्ष चतुर्वेदी बताते हैं कि ( इस कोरोना महामारी के दौरान अलग-अलग देशों को अलग-अलग तरह के संघर्षों का सामना करना पड़ा. भारत एक ऐसा राष्ट्र है, जिसने अपनी जीविका कमाने के लिए विभिन्न शहरों में जाने वाले प्रवासी मजदूरों की बड़ी मात्रा में आवाजाही का सामना किया। डॉक्यूमेंट्री "वॉकिंग अंडर द सन" इन मजदूरों की समस्याओं पर केंद्रित है और इस मुद्दे को लेकर सरकार की नीतियों पर कुछ सवाल उठाती है।
जब हम उनकी इस फिल्म ( देशभक्त ) पर बात करते है वो बड़ी ही सादगी से यह कह देते है की यह उनके साथ घटी एक घटना का प्रतिरूप है मैं शायद इस बात को सहजता से स्वीकार भी कर लेता मगर मैं जनता हूँ की किसी फिल्म के बनने में जितना समय लगता है उससे अधिक मंथन उसके विचार से पटकथा तक जाने के बीच होता है। इस फिल्म में उत्कर्ष ने एक ऑटो ड्राइवर के देशभक्त पिता की शहादत के बाद उसी जज़्बे को सीने में लिए दिखाया है। सच्ची देशभक्ति सिर्फ १५ अगस्त या २६ जनवरी को नहीं दिखाई जाती ,सच्ची देशभक्ति तो हमारे दिलों में होनी चाहिए। जिन्होंने देश पर जान दी है उनके परिवारों में झांक कर देखिये देशभक्ति का जज़्बा बहता हुवा दिखाई पड़ेगा। देशभक्ति पर बात करती उत्कर्ष की यह फिल्म ( रे एशियन फिल्म फ़ेस्टिवल ) में शॉर्ट फिल्म्स की श्रेणी में चयनित हुई है। इस फिल्म में सोभित गुप्ता ने अहम् भूमिका निभाई है और वो इस फिल्म के एडिटर भी हैं। भाषा में बुंदेलखंडी रंग का श्रेय उत्कर्ष जी सोभित को देते हैं। अभी उनकी यह फिल्म mx player पर उपलब्ध है।
Ashish Mohan

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