मेरे आस पास
जो कुछ भी घटित होता है वह कहीं न कहीं मुझे सोचने पर मजबूर करता है ।वह बात अलग है
कि मैं अपने कान और आँखे बंद कर लूँ ।और अगर
नहीं बंद करता हूँ तो सोचता हूँ,जब सोचता हूँ तो गुस्सा भी आता है और दुःख भी होता
है।हो सकता है कि मेरी कही बातें आप को पसंद न आये।माफ़ कर दीजियेगा मगर मैंने किसी
को भी खुश करने के लिहाज से नहीं लिखा है।मैंने सिर्फ वह लिखा है जो मुझे महसूस हुआ,जो
मैंने समझा,जो मैंने देखा ।समाज में जो कुछ भी होता है वो अगर सही नहीं है तो सवाल
उठेंगे और हज़ार बार उठेंगे। मेरे भीतर उठने वाले सवाल किसी व्यक्ति विशेष से नहीं है,ये
सवाल पूरे समाज से हैं। हमारा जागरूक होना ज़रूरी है। राज धर्म का पालन कोई नहीं करता
मगर राज सभी को करना है। ऐसा नहीं है की अभी तक जो भी राजनेता हुए वो सभी बुरे थे पर
वो कम थे। आज भी हमारे देश में बहुत से हिस्से ऐसे है जो आधुनिकता से कोसों दूर हैं,
जिन्हें वो चीजे भी नहीं मिली हैं जो बहुत ज़रूरी हैं... जैसे
शिक्षा,इलाज,सड़क,पानी आदि। हमारा देश बहुत तेजी से तरक्की कर रहा है पर उस तरक्की का
क्या फायदा जब मूलभूत ज़रूरते भी पूरी न हो सके।ऐसा भी नहीं है की काम नहीं हो रहा है
,काम तो लगातार हो रहा है मगर उस तरह नहीं हो रहा जिस तरह होना चाहिए,एक सड़क बार-बार
बनाई जाती है बार-बार तोड़ी जाती है।क्या हम उसे एक बार में ढंग से नहीं बना सकते।बना
सकते है पर जितनी बार बनेगी उतनी बार ठेके उठेंगे,उतनी बार सामान आएगा उतनी बार कमीशन
मिलेगा ।और अगर ऐसा नहीं है तो क्यों नहीं बनायीं जाती एक बार में? सरकारी अस्पतालों
में डॉक्टर नहीं हैं,स्कूलों में टीचर नहीं हैं।ऐसा नहीं है की भर्ती नहीं हुए... हुए,पर
जाते नहीं।अब ये गलती सरकार की नहीं है,ये हमारी नालायकी है।मैं खुद सरकारी स्कूल से
पढ़ाई कर के आया हूँ,मुझे लगता है की मेरी उम्र के ज्यादातर लोगों ने सरकारी स्कूलों
से पढ़ाई की है,तब होती थी पढ़ाई।तब तो इतने स्कूल भी नहीं थे जितने आज हैं । आज इतनी
सुविधाएँ मिलती है स्कूल में फिर भी पढ़ाई नहीं होती,खाने की सुविधा,ड्रेस की सुविधा,
किताबों और जूतों की सुविधा,फीस माफ़।पढ़ाई का स्तर भी निल बटे
सन्नाटा।क्या कारण है की इतनी सुविधाओं के बावजूद भी लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों
में पढ़ाना नहीं चाहते,जब की कितने भी गरीब लोग हो वो चाहते है की उनके बच्चे पढ़ें।सरकारी
स्कूलों का स्तर इतना गिर क्यों रहा है? क्या ये सारी सुविधाएँ हटा कर सिर्फ पढ़ाई पर
जोर देना चाहिए या स्कूलों से पढ़ाई वाला काम ही हटा देना चाहिए? मैं इतना बुद्धिजीवी
तो नहीं हूँ जो देश चलने के तरीके बताऊँ मगर एक बात जो मैं समझता हूँ वो ये की यदि
शिक्षा में सुधर होगा तो देश खुद बखुद तरक्की करेगा। अस्पतालों में डॉक्टर नहीं है
अपनी-अपनी दुकाने खोल कर बैठे है हालाँकि अभी इनपर काफी हद तक पाबन्दी लगी है लेकिन
ये पूरीतरह से नहीं रुका। शिक्षा और स्वास्थ्य की बात की मैंने दोनों लचर हालत में
है। अब अगर बात करे सुरक्षा की तो वो तो और भी बुरी हालत में है ,लड़किया सुरक्षित नहीं
है,बच्चे सुरक्षित नहीं है घर परिवार,नगर ,महानगर कुछ भी सुरक्षित नहीं है । आये दिन
नन्ही-नन्ही बच्चियों के साथ दुष्कर्म की घटनायें सुनने को मिलती है। भाईसाब ...आप
किसी भी दिन का अख़बार उठा लो या समाचार सुन लो, ऐसा हो ही नहीं सकता की बलात्कार की
खबर न मिले। आप को वो ख़बरें सुनने को मिल जाती हैं जो उजागर हो जाती हैं ऐसी कितनी
घटनायें होंगी जो लोकलाज के चलते दबा दी जाती होंगी या ऐसे कितने उत्पीड़न होंगे जो
किसी न किसी डर की वजह से सामने नहीं आते। कही भी किसी को मार दिया जाता है, कही भी
किसी को लूट लिया जाता है, और हम ........................पन्ना पलट देते है या चैनल
चेंज कर देते है।हमारे परम लाड़ले, हर दिल अज़ीज़ नेता जी ट्विटर पर चोंच लड़ाते रहते हैं।बलात्कार
में भी वो अपने जादुई चश्मे से जाति ढूंढ ही लेते हैं, कितनी कमाल की बात है न।यहाँ
बलात्कार किसी बहन या बेटी का नहीं होता बल्कि हिन्दू या मुस्लमान का होता है,दलित
या सवर्ण का होता है।फिर उस पीड़िता के दुःख को कोई हमदर्द नेता अपना लेता है और शहर
में मोमबत्तियों की बिक्री तेज हो जाति है, भले उसके घर में अँधेरा हो गया हो ,कोई
फर्क नहीं पड़ता। we want justice.........we want justice के नारे लगते हैं।फिर लोग
घर चले जाते हैं और उस नन्हे से प्यारे से नवजात नेता का अगले चुनाव में बेड़ा पार हो
जाता है। वो बच्ची कहा कहाँ गयी - उन हैवानों का क्या हुआ, किसे पता। कल फिर कोई घटना
होगी ,फिर मोमबत्तियां जलेंगी पर ये घटनायें बंद नहीं होंगी। व्हाट्सप और फेसबुक पर
चर्चायें भी होती हैं, ये तो मैं भूल ही गया था। कोई गंवार सा नेता कोई ओछा सा बयान
दे देगा और मुद्दा पलट जायेगा। सारे न्यूज़ चैनल उस महान नेता के मुखारबिंदु से निकली उस लाख टके की बात को 24 घंटे तक लगातार
दिखा कर अपने फ़र्ज़ को पूरा करेंगे। और हम भी अपने-अपने विवेक के अनुसार चाय की चुस्कियों
के साथ उस परम ज्ञानी के महान विचारों की व्याख्या करते नहीं थकते।राजनीती कहाँ जा
रही है, सोचता हूँ तो डर जाता हूँ की ऐसी फूहड़ विचारधारा के साथ कैसे होगा विकास। कोई
भी नेता कोई भी बयान देता है,किसी को भी कुछ भी बोल देता है,अरे हद तो इस बात की भी
हो गयी है की स्वतंत्रता संग्राम में अपने आप को न्योंछावर करने वाले पूज्य सेनानियों
को भी ये जातियों में बाँट कर देखते हैं और दिखाते भी हैं,उन पर भी बयान बाजी करते
हैं।कितना कष्ट होता होगा उनकी आत्माओं को जब वो देखते होंगे कि इनके लिए हमने देश
आज़ाद करवाया था,इनके लिए हमने जान दी। झूठ
फरेब धोखा ये शब्द आज की तारीख़ में कान खड़े नहीं करते क्योंकि ये आम बात हो गयी है,
राजनीती में तो खासकर।मैं इस बात से इंकार नहीं करता की जनता दोषी नहीं है, अगर नहीं
होती तो सरकारी चीजों की चोरी नहीं करती,सरकारी सुविधाओं का दुरूपयोग नहीं करती,अपनी
जिम्मेदारियों को निभाने में लापरवाही न करती।ये जो हम पर शासन करने वाले हैं ये हमारे
आप के बीच से ही जाते हैं जनता अगर चाहे तो ये एक बार में सुधर जाये,ये गलती है जनता
की जो इनके बहकावे में आ जाती हैं,जातिगत आधार पर वोट देती है।गलत है मैं मानता हूँ।मगर
जनता को यदि सही रास्ता दिखाया जाये तो वो गलत नहीं है वो भी सही कर सकती है,किसी भी जाति की दूसरी जाति से कोई लड़ाई नहीं है अगर
ऐसा होता तो मुसीबत के समय पर जो एकता देखने
को मिलती है वो न दिखती ।ये तो इस देश की भौगोलिक और सांस्कृतिक बनावट ही ऐसी है जो
सब कुछ भूल कर आगे बढ़ने के लिए और सदैव खुश रहने, मदद करने
के लिए प्रेरित करती है।इतना सुन्दर देश है इतनी सुन्दर इसकी जीवन शैली है पुरे ब्रह्माण्ड
में शायद ही कोई दूसरा देश ऐसा हो। सिर्फ़ और सिर्फ़ राजनीती ही ऐसी चीज है जो इसे गन्दा
करने पर तुली है। मैं बार-बार राजनीती शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ,इससे मेरा तात्पर्य
सिर्फ और सिर्फ वर्तमान राजनीती से है।देश आजाद होने के बाद से लेकर आज तक देश ने बहुत
विकास किया है इसमें कोई दो राय नहीं मगर साथ ही बहुत कुछ खोया भी है , मेरी बहुत ज्यादा
उम्र तो नहीं परन्तु जितनी भी जिंदगी मैंने जी है उसमे मैंने बहुत से मूल्यों को खोते
और संवेदनाओ को गिरते देखा हैI बेशक हम आधुनिकता की तरफ कई कदम आगे बढ़ गए हैं परन्तु
शिक्षा,स्वास्थ्य,सुरक्षा इनका स्तर अभी वो नहीं आया जो हमसे बाद में आज़ाद हुए देशों
ने प्राप्त कर लिया है।और यह सिर्फ और सिर्फ इस लिए हुवा क्योकि ये सारे मुद्दे खिलवाड़
बन गए राजनीती का । यही वो मुद्दे है जो नींव
होते है किसी भी देश के विकास के।मैं विनती करता हूँ की इन्हें राजनीती से दूर रखें।
हम और आप कितनी भी तरक्की कर लें परन्तु जब तक देश तरक्की नहीं करेगा तब तक हम विश्व
मंच पर पिछड़े ही कहे जायेंगे।राजनीती पर अगर किसी से बात करो तो वो यही कहेगा की गंदगी
साफ करने के लिए गंदगी में उतरना पड़ता है। बहुत पुरानी कहावत है,30 साल से तो मैं ही
सुन रहा हूँ,जो भी ये गंदगी साफ करने के लिए गंदगी में उतरा वो दोबारा निकला नहीं,उसे
उसी में मज़ा आ गया। तो भैया ये कहावत तो बन गई राजनीती में प्रवेश करने के लिए एंट्री-कोड।या
आप मान लो यही वो पहला झूठ है जो नेताजी पहली बार बोलते हैं।उसके बाद तो आप बटोर भी
नहीं पाओगे इतने झूठ बोलते हैं।अच्छा एक बात है ये कितने भी बेईमान हों पर 5 साल में
एक बार आप के पांव छूने जरूर आते हैं वो बात अलग है की उसके बाद व्यस्तता के चलते उनके
रथ आप की गलियों में आना भूल जाते हैं।इसमें उनकी गलती नहीं है... अरे भाई जनता की
सेवा के अलावा उनके पास हज़ारो काम हैं,जनता का क्या है भूखी है तो क्या हुआ,शरीर को
स्वस्थ रखने के लिए अल्पाहार करना चाहिए।सड़क में गड्ढे हो गए हैं तो वो आप के भले के
लिए ही तो हैं- रोड चिकनी होगी तो गाड़ियां तेज चलेंगी, गाड़ियां तेज चलेंगी तो दुर्घटनायें
होंगी, दुर्घटनायें होंगी तो अस्पतालों के खर्चे बढ़ेंगे, खर्चे ज्यादा
होंगे तो चोरियाँ बढ़ेंगी , चोरियाँ होंगी तो देश चैन
की नींद सो नहीं पायेगा,तो भैया देश में अमन और चैन रखने के लिए सड़को में गड्ढे होने
जरुरी हैं। है की नहीं। एक बात सोच कर देखो अगर हर नेता उसे मिलने वाली निधि से सिर्फ
अपने शहर गांव का ही विकास कर दे तो सिर्फ 5 सालों में देश की सूरत बदल सकती है ऐसा
हम लोग सोचते हैं वो अगर गांव शहर का विकास करने लगे तो फिर उनके परिवार का विकास कैसे
हो। ऐसा नहीं है अगर एक नेता जी अपने परिवार वालों के लिए फैक्ट्रियां खुलवाते हैं
तो उससे जनता को ही तो रोजगार मिलता है।हम बिना मतलब ही बेचारों को दोषी बना देते हैं।तुम्हारे
गांव तक पक्की सड़क हो जाएगी,स्कूल खुल जायेंगे,बिजली आ जायेगी,महंगाई कम हो जाएगी तो
तुम आलसी हो जाओगे फिर तुम काम नहीं करोगे,नेताजी तुम्हारे भले के लिए ही तो तुम्हारा
विकास नहीं होने देते, है ना नेताजी? ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिनकि बात हम सब करते
हैं लेकिन उन्हें हल करने कि कोशिश नहीं करते।बड़ी-बड़ी सभायें होती हैं और होती रहेंगी,
लोग आएंगे और चाय समोसे खाकर चले जायेंगे।देश वहीं का वहीं, समाज वहीं का वहीं।
एक ही समाज हैं तो उसके इतने टुकड़े क्यों हैं?
और अगर टुकड़े हैं तो आपस में लड़ते क्यों हैं? हर तरफ इतना झूठ क्यों हैं? एक ही बात
एक के लिए सही और दूसरे के लिए गलत क्यों हैं? प्रतिभा से ज्यादा डिग्री को एहमियत
क्यों हैं? बेटियों में इतना डर क्यों? भूख और गरीबी क्यों? दंगे क्यों? जाति के नाम
पर लड़ाई क्यों? दिखावा क्यों? फरेब क्यों? लूट क्यों? दर्द क्यों? राजनीती में चोर
क्यों? विश्वास क्यों नहीं? प्यार क्यों नहीं? अपनापन क्यों नहीं? ऐसे तमाम सवाल हैं
जिनका जवाब नहीं मिल रहा बस इसी बात से नाराज हूँ मैं, हाँ नाराज हूँ मैं।
थोड़ा नाराज हूँ मैं...............
Ashish Mohan

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